साइबर अपराधी म्यूल बैंक खातों और क्रिप्टो के जरिए चोरी के करोड़ों रुपये कैसे कर देते हैं गायब
छात्रों और गरीब ग्रामीणों के नाम पर खोले गए बैंक खातों के जरिए कैसे सेकंडों में विदेशी क्रिप्टो एक्सचेंजों में ट्रांसफर कर दिए जाते हैं साइबर फ्रॉड के पैसे।

साइबर अपराध की दुनिया में 'म्यूल अकाउंट्स' (Mule Accounts) वह गुप्त रीढ़ हैं, जिनके बिना कोई भी ऑनलाइन वित्तीय धोखाधड़ी संभव नहीं है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) और साइबर सेल की हालिया रिपोर्टों से पता चला है कि ठगी के पैसों को सेकंडों में गायब करने के लिए हजारों लेयर्ड बैंक खातों का विशाल नेटवर्क काम कर रहा है।
कैसे तैयार होते हैं ये म्यूल खाते?
साइबर गिरोह कॉलेज के छात्रों, दिहाड़ी मजदूरों और बेरोजगार युवाओं को ₹5,000 से ₹10,000 के कमीशन का लालच देकर उनके नाम पर करंट और सेविंग्स अकाउंट खुलवाते हैं। इन खातों की नेट बैंकिंग क्रेडेंशियल्स, सिम कार्ड और एटीएम कार्ड गिरोह के ऑपरेटर अपने पास रख लेते हैं।
मनी लॉन्ड्रिंग का तेज चक्रव्यूह
जैसे ही किसी पीड़ित से ठगी की रकम खाते में आती है, स्वचालित बॉट्स (Bots) के जरिए उस पैसे को 10 अलग-अलग खातों में बांट दिया जाता है (लेयरिंग)। तीसरे या चौथे स्तर तक पहुंचते-पहुंचते इस रकम से पीयर-टू-पीयर (P2P) क्रिप्टो खरीद ली जाती है और फंड्स देश से बाहर निकल जाते हैं।
कानूनी चेतावनी
आरबीआई और पुलिस ने चेतावनी दी है कि अपने बैंक खाते को किसी अन्य व्यक्ति को पैसे के लेन-देन के लिए देना एक गंभीर संज्ञेय अपराध है। ऐसे खाताधारकों को मनी लॉन्ड्रिंग और साइबर अपराध का सीधा सह-अभियुक्त माना जा रहा है।

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