छत्रपति शिवाजी महाराज ने 1666 में औरंगजेब के कड़े पहरे को मात देकर कैसे रची ऐतिहासिक रिहाई
मुगल दरबार में कूटनीतिक चाल, बीमारी का रणनीतिक दिखावा और मिठाई के टोकरों से आगरा के कड़े पहरे को भेदने वाली छत्रपति शिवाजी महाराज की वो ऐतिहासिक रणनीति जिसने भारत का इतिहास बदल दिया।


12 मई 1666 की उमस भरी दोपहर में, आगरा के किले में स्थित दीवान-ए-खास को मुगल साम्राज्य के सर्वोच्च वैभव और सख्त दरबारी शिष्टाचार के साथ सजाया गया था। बादशाह मुही-उद-दीन मुहम्मद औरंगजेब आलमगीर अपने 50वें चंद्र जन्मदिन के भव्य जलसे में तख्त-ए-ताऊस पर विराजमान था। दरबारी अपने ओहदों और मनसब के अनुसार कतारों में सिर झुकाए खड़े थे। लेकिन चंद मिनटों में ही दरबार की यह सधी हुई औपचारिकता एक अभूतपूर्व खुली बगावत में बदल गई, जिसने मुगल सल्तनत की नींव हिला दी।
छत्तीस वर्षीय मराठा छत्रपति, शिवाजी महाराज, ने अपने स्वाभिमान से रत्ती भर भी समझौता करने से साफ इनकार कर दिया। जब उन्हें उनकी प्रतिष्ठा के विपरीत 5,000 के मनसबदारों की तीसरी कतार में खड़ा किया गया, तो उन्होंने इसे अस्वीकार्य अपमान माना। उन्होंने दरबारी नियमों की परवाह किए बिना तख्त की तरफ पीठ फेर ली और भरे दरबार में स्पष्ट ऐलान किया कि वे अपमान सहने के बजाय मृत्यु को गले लगाना बेहतर समझते हैं।
सत्रहवीं शताब्दी के भारत के दो सबसे शक्तिशाली व्यक्तित्वों के बीच शुरू हुई यह कूटनीतिक वार्ता विश्व इतिहास की सबसे साहसी और सनसनीखेज रिहाई में बदल गई—जिसे आगरा से ऐतिहासिक रिहाई (Agra Escape) के नाम से जाना जाता है। 99 दिनों के भीतर, शिवाजी महाराज ने हजारों मुगल सैनिकों से घिरी सख्त नजरबंदी को एक ऐसे ऐतिहासिक घटनाक्रम में बदल दिया, जिसका पछतावा औरंगजेब को अपनी मृत्युशैया तक रहा।
I. आगरा की राह: मिर्जा राजा जयसिंह का वचन
यह समझने के लिए कि शिवाजी महाराज नौ सौ मील उत्तर में आगरा के शेर की मांद में क्यों आए, हमें जून 1665 की पुरंदर की संधि को समझना होगा। मिर्जा राजा जयसिंह प्रथम—आमेर के कछवाहा राजपूत राजा और मुगल सेनापति—ने पुरंदर के किले का घेरा डाला था। जयसिंह एक अनुभवी कूटनीतिज्ञ थे। वे जानते थे कि मराठों के पहाड़ी किलों को तलवार के बल पर जीतना आसान नहीं है।
जयसिंह ने शिवाजी महाराज को आगरा आकर औरंगजेब से मिलने के लिए राजी किया। शिवाजी महाराज मुगलों की नीयत से भली-भांति वाकिफ थे। वे अफजल खान के धोखे और शाइस्ता खान पर रात में किए गए हमले के बाद सतर्क थे। उन्होंने जयसिंह से ठोस गारंटी मांगी।
"मिर्जा राजा जयसिंह ने गंगाजल और अपने राजपूत सम्मान की शपथ ली कि शिवाजी महाराज और उनके पुत्र संभाजी के सम्मान और जीवन की रक्षा का दायित्व उनका खुद का और उनके पुत्र कुंवर रामसिंह का होगा।"
II. 12 मई का टकराव: दीवान-ए-खास में स्वाभिमान की गर्जना
जब शिवाजी महाराज अपने नौ वर्षीय पुत्र संभाजी और चुनिंदा सरदारों के साथ दीवान-ए-खास पहुंचे, तो औरंगजेब ने जानबूझकर उपेक्षा का व्यवहार किया। न तो औपचारिक स्वागत किया गया और न ही उचित सम्मान। इसके बजाय शिवाजी महाराज को जसवंत सिंह राठौड़ जैसे उन सरदारों के पीछे खड़ा किया गया, जिन्हें मराठा सेना पहले युद्ध के मैदान में हरा चुकी थी।
शिवाजी महाराज ने मौके पर ही तीखा विरोध दर्ज कराया। उन्होंने कुंवर रामसिंह से कहा, "क्या मैं इस लायक हूं कि मुझे तीसरे दर्जे के मनसबदारों के पीछे खड़ा किया जाए?" दरबार में सन्नाटा छा गया। शिवाजी महाराज वहां से बाहर निकल आए। औरंगजेब के लिए यह सीधे शाही सत्ता को चुनौती थी। उसी रात शिवाजी महाराज के आवास को मुगल सैनिकों ने घेर लिया।
III. सुनहरी कैद: आगरा में नजरबंदी का कड़ा पहरा
शिवाजी महाराज को जयपुर भवन में नजरबंद कर दिया गया। आगरा के कोतवाल फौलाद खान को सख्त आदेश दिए गए। फौलाद खान ने भवन के चारों ओर तोपें, बंदूकधारी और कड़े सुरक्षा पहरे लगा दिए। किसी भी मराठा को बिना तलाशी बाहर जाने की अनुमति नहीं थी।
दरबार में वजीर जाफर खान और शाइस्ता खान के रिश्तेदार शिवाजी महाराज को मरवाने या किसी दूरस्थ किले में हमेशा के लिए कैद करने की साजिशें रचने लगे। शिवाजी महाराज भांप गए कि अब केवल असाधारण बुद्धिमत्ता और कूटनीतिक चाल से ही बाहर निकला जा सकता है।
IV. रिहाई की रणनीति: दुश्मन के दिमाग को मात देना
शिवाजी महाराज ने तीन चरणों वाली एक ऐसी मनोवैज्ञानिक रणनीति बनाई जिसने मुगलों के पहरे को पूरी तरह भ्रमित कर दिया:
पहला चरण: हार मान लेने का भ्रम पैदा करना
शिवाजी महाराज ने औरंगजेब को पत्र लिखकर कहा कि वे अपनी सारी सेना को दक्कन वापस भेजना चाहते हैं और खुद संन्यासी बनकर काशी में रहना चाहते हैं। औरंगजेब ने इसे मराठा छत्रपति का आत्मसमर्पण माना और मराठा सैनिकों को आगरा छोड़ने का परवाना जारी कर दिया। इससे आगरा में पहरेदारों को लगा कि शिवाजी महाराज अब पूरी तरह असहाय और अकेले हैं।
दूसरा चरण: बीमारी का रणनीतिक दिखावा
जुलाई 1666 में शिवाजी महाराज ने गंभीर बीमारी का नाटक किया। उन्होंने घोषणा की कि वे असाध्य रोग से पीड़ित हैं। हकीमों और वैद्यों को बुलाया गया। ठीक होने की मन्नत के रूप में उन्होंने आगरा के ब्राह्मणों, फकीरों, सूफियों और सरदारों में मिठाई और फलों के बड़े-बड़े टोकरे बांटने शुरू कर दिए।
तीसरा चरण: सुरक्षा जांच को सुस्त करना
शुरुआती दिनों में फौलाद खान के सिपाही हर टोकरे की तलवारों से जांच करते थे। लेकिन हफ्तों तक हर दिन दर्जनों टोकरे निकलने से सिपाही ऊब गए। कुछ ही हफ्तों में पहरेदार सिर्फ औपचारिकता निभाते और बिना देखे टोकरों को जाने देते। यही वह मौका था जिसका शिवाजी महाराज इंतजार कर रहे थे।
V. 17 अगस्त 1666: ऐतिहासिक रिहाई का वो साहसी पल
17 अगस्त 1666 की शाम को अंतिम योजना क्रियान्वित की गई। छत्रपति शिवाजी महाराज और राजकुमार संभाजी मिठाई के दो विशाल टोकरों में बैठ गए। उनके विश्वासपात्र हमशक्ल हीरोजी फर्जंद शिवाजी महाराज के वस्त्र पहनकर पलंग पर सो गए, ताकि बाहर से देखने वाले को लगे कि महाराज अब भी बीमार लेटे हैं। मदारी मेहतर पैर दबाने का नाटक करता रहा।
टोकरे बिना किसी रुकावट के जयपुर भवन से बाहर निकाल दिए गए। शहर से कुछ मील दूर पहले से तैयार गुप्त स्थान पर शिवाजी महाराज और संभाजी बाहर निकले। वहां उनके विश्वासपात्र सरदार घोड़ों के साथ मौजूद थे।
आगरा रिहाई के प्रमुख वीर नायक:
- हीरोजी फर्जंद: महाराज के हमशक्ल जिन्होंने अपनी जान हथेली पर रखकर बिस्तर पर सोने का नाटक किया।
- मदारी मेहतर: विश्वासपात्र सेवक जिन्होंने सुबह तक पहरेदारों को धोखे में रखा।
- रघुनाथ बल्लाल कोरडे और त्र्यंबक सोनदेव: बाहर गुप्त ठिकानों और घोड़ों की व्यवस्था करने वाले रणनीतिकार।
VI. अगली सुबह: मुगल दरबार में हड़कंप
अगली सुबह जब हीरोजी फर्जंद और मदारी मेहतर भी चुपचाप बाहर निकल गए, तब जाकर फौलाद खान को सच्चाई का पता चला। बिस्तर खाली था! आगरा का कोतवाल कांप उठा। जब औरंगजेब को खबर दी गई, तो वह सन्न रह गया। पूरा आगरा शहर सील कर दिया गया। हजारों सवार चारों दिशाओं में दौड़ाए गए, लेकिन मराठा छत्रपति हवा की तरह गायब हो चुके थे।
VII. दक्षिण की रहस्यमयी यात्रा
शिवाजी महाराज जानते थे कि मुगल सेना उन्हें दक्षिण के सीधे रास्ते (मालवा और खानदेश) पर खोजेगी। इसलिए उन्होंने उल्टा रास्ता चुना। वे साधुओं का भेष बनाकर पूर्व की ओर मथुरा, प्रयागराज, वाराणसी, गया और ओडिशा के कटक होते हुए महीनों बाद सुरक्षित राजगढ़ पहुंचे।
जब वे राजगढ़ पहुंचे, तो पूरे महाराष्ट्र में विजय के नगाड़े बज उठे। यह केवल एक कैद से रिहाई नहीं थी, बल्कि हिंदवी स्वराज्य के पुनर्जन्म का वो क्षण था जिसने मुगलों के अजेय होने के भ्रम को सदा के लिए तोड़ दिया।
VIII. ऐतिहासिक निष्कर्ष: भारत का भाग्य बदलने वाला मोड़
इतिहासकार मानते हैं कि यदि 1666 में आगरा में शिवाजी महाराज की हत्या कर दी गई होती, तो भारतीय उपमहाद्वीप का इतिहास कुछ और ही होता। इस रिहाई के आठ वर्ष बाद, 1674 में छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक हुआ और उन्होंने एक संप्रभु मराठा साम्राज्य की स्थापना की जिसने आगे चलकर मुगल सल्तनत का अंत किया।
औरंगजेब ने अपनी वसीयत (रुक्का-ए-आलमगीरी) में लिखा था: "मेरी सल्तनत की सबसे बड़ी भूल आगरा में शिवाजी को नजरअंदाज करना था। उस एक लापरवाही ने मेरे सारे जीवन के परिश्रम को व्यर्थ कर दिया।"

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